कथा
होली का पर्व फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस पर्व के पीछे दो प्रमुख कथाएं हैं। पहली कथा भक्त प्रह्लाद और होलिका की है — असुर राज हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था) को प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जल गई। दूसरी कथा वृंदावन की है जहाँ श्री कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेला था।
महत्व
होली बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। होलिका दहन पाप और नकारात्मकता के नाश का प्रतीक है। अगले दिन रंगों से खेलना प्रेम, भाईचारे और खुशी का उत्सव है। यह पर्व सामाजिक बंधनों को तोड़कर समानता का संदेश देता है।
पूजा विधि
होलिका दहन से एक दिन पहले होली की जगह साफ करें
होलिका दहन से पहले गाय के गोबर से होलिका और प्रह्लाद की मूर्तियाँ बनाएं
होलिका दहन के समय परिक्रमा करें और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करें
होली के रोज सुबह स्नान करके नए वस्त्र पहनें
बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लें
प्राकृतिक और हर्बल रंगों से होली खेलें
शाम को स्नान करके माता के मंदिर में दर्शन करें
