कथा
करवा चौथ कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को मनाया जाता है। इस व्रत से जुड़ी एक प्रमुख कथा रानी वीरावती की है जिन्होंने पहली बार सुहाग की रक्षा के लिए यह कठिन व्रत रखा था। सती के करवा की कथा में एक पतिव्रता स्त्री ने यमराज से अपने पति को बचाया था। इस व्रत की परंपरा महाभारत काल से है — द्रौपदी ने भी अर्जुन की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था।
महत्व
करवा चौथ पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए सुहागन स्त्रियों का प्रमुख व्रत है। इस दिन निर्जल व्रत रखकर चंद्रमा के दर्शन के बाद पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोला जाता है। यह प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।
पूजा विधि
सूर्योदय से पहले सरगी खाएं (सास द्वारा दी गई सामग्री)
दिनभर निर्जल व्रत रखें
शाम को सोलह श्रृंगार करें
करवा चौथ की कथा पढ़ें या सुनें
थाली में दीपक, करवा (मिट्टी का पात्र), चलनी और आभूषण रखें
चंद्रमा के उदय होने पर चलनी से पहले चाँद देखें, फिर पति का मुख देखें
पति के हाथ से जल और मिठाई लेकर व्रत खोलें
