
कार्तिकेय
सेनापति, तारकासुर विनाशक
परिचय
भगवान कार्तिकेय शिव और पार्वती के पुत्र और देवताओं के सेनापति हैं। वे स्कंद, मुरुगन और षण्मुख (छह मुख वाले) भी कहलाते हैं। दक्षिण भारत में वे मुरुगन के नाम से अत्यंत पूजनीय हैं।
कथा
तारकासुर नामक असुर ने देवताओं को परास्त कर दिया था। ब्रह्मा के वरदान के कारण उसे केवल शिव पुत्र ही मार सकता था। इसलिए देवताओं ने शिव-पार्वती के विवाह की योजना बनाई। शिव जी के तेज से जन्म लेने के बाद कार्तिकेय का पालन-पोषण कृत्तिका नक्षत्रों ने किया, इसलिए कार्तिकेय नाम पड़ा। उन्होंने तारकासुर का वध किया और देवताओं को स्वर्ग वापस दिलाया। उनकी सवारी मोर है और हाथ में शक्ति नामक अस्त्र है। दक्षिण भारत में उनकी पूजा विशेष रूप से होती है।
महत्व
कार्तिकेय युद्ध, विजय और साहस के देवता हैं। उनकी पूजा से शत्रुओं पर विजय, साहस और नेतृत्व की शक्ति प्राप्त होती है।
शक्तियाँ
- शक्ति अस्त्र से असुरों का नाश
- मोर वाहन पर आरूढ़ होकर सर्पों (अज्ञान) का नाश
- छह मुखों से छह दिशाओं की रक्षा
- देव सेना के सेनापति की रणनीतिक शक्ति
- तारकासुर जैसे महाबली असुरों का वध
आशीर्वाद
- शत्रुओं पर विजय और युद्ध में सफलता
- साहस, वीरता और नेतृत्व की शक्ति
- रोग और दोष निवारण
- संतान प्राप्ति और पुत्र की रक्षा
- आध्यात्मिक शक्ति और सिद्धि की प्राप्ति
प्रमुख मंत्र
आरती
सामान्य प्रश्न
कार्तिकेय और गणेश में पहले किसे पूजा जाता है?
भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जो पृथ्वी की परिक्रमा पहले करेगा वह प्रथम पूजनीय होगा। गणेश जी ने माता-पिता की परिक्रमा को पृथ्वी की परिक्रमा माना और जीत गए।
स्कंद षष्ठी का महत्व क्या है?
स्कंद षष्ठी (कंद षष्ठी) कार्तिकेय का जन्मोत्सव है जो मुख्यतः दक्षिण भारत में मनाया जाता है। इस दिन छह दिनों का उपवास रखने से कार्तिकेय की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
कार्तिकेय का मोर वाहन क्यों है?
मोर सर्पों को नष्ट करता है। सर्प अज्ञान और काम-क्रोध का प्रतीक है। कार्तिकेय ज्ञान और साहस के देवता हैं इसलिए अज्ञान नाशक मोर उनका वाहन है।
दक्षिण भारत में कार्तिकेय को मुरुगन क्यों कहते हैं?
तमिल भाषा में "मुरु" का अर्थ सुंदर है। मुरुगन का अर्थ है सुंदर देवता। दक्षिण भारत में कार्तिकेय तमिल संस्कृति के सबसे प्रमुख देवता हैं और उनकी पूजा वहाँ विशेष रूप से होती है।
