गोवर्धन धारण: सात दिन तक उंगली पर पर्वत
इंद्र की पूजा रोककर कान्हा ने गोवर्धन पूजन कराया। क्रोधित इंद्र ने मूसलाधार वर्षा भेजी। तब नन्हे कृष्ण ने क्या किया?
हर वर्ष ब्रजवासी वर्षा के देवता इंद्र की बड़ी पूजा करते थे। उस वर्ष तैयारियाँ देखकर बालक कृष्ण ने नंद बाबा से पूछा, "बाबा, यह पूजा किसके लिए है?"
नंद बाबा बोले, "इंद्रदेव वर्षा देते हैं, उसी से घास उगती है और हमारी गायें पलती हैं।" कृष्ण मुस्कुराए, "बाबा, हमारी गायें तो गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं। वही हमें घास, जल और छाया देता है। पूजा तो गोवर्धन की होनी चाहिए।"
बालक की बात सबको भा गई। उस वर्ष ब्रज ने गोवर्धन की पूजा की, अन्नकूट का भोग लगाया और गायों को सजाया। यह सुनकर इंद्र का अहंकार भड़क उठा। उन्होंने प्रलय के मेघों को आज्ञा दी कि ब्रज को डुबो दो।
आकाश फट पड़ा। ओले, आँधी और मूसलाधार वर्षा से ब्रज काँप उठा। सब कृष्ण के पास दौड़े। कृष्ण ने शांत भाव से गोवर्धन पर्वत को बाएँ हाथ की सबसे छोटी उंगली पर ऐसे उठा लिया जैसे कोई बालक छतरी उठाता है। सारे ग्वाल, गोपियाँ, गायें और बछड़े पर्वत के नीचे आ गए।
सात दिन और सात रात वर्षा होती रही, और सात दिन तक कान्हा बिना हिले पर्वत थामे रहे। ग्वालों ने भी अपनी लाठियाँ पर्वत से टिका दीं, यह सोचकर कि वे भी सहायता कर रहे हैं। कान्हा ने उन्हें यह भ्रम रहने दिया, क्योंकि भगवान भक्त के छोटे से प्रयास को भी मान देते हैं।
अंत में इंद्र का अहंकार टूटा। वे ऐरावत से उतरकर आए और क्षमा माँगी। कामधेनु ने दूध से कृष्ण का अभिषेक किया और उन्हें "गोविंद" नाम मिला। तभी से दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का उत्सव मनाया जाता है।
