अष्टावक्र और राजा जनक: शरीर नहीं, ज्ञान देखो
आठ जगह से टेढ़े शरीर वाला बालक राजा जनक की सभा में पहुँचा तो पंडित हँस पड़े। फिर बालक भी हँसा।
ऋषि कहोड़ का पुत्र अष्टावक्र जन्म से ही आठ जगह से टेढ़ा था। कहते हैं कि गर्भ में रहते हुए उसने पिता के वेद-पाठ में त्रुटि बताई थी, और क्रोधित पिता के शाप से उसका शरीर टेढ़ा हो गया।
बारह वर्ष का होते-होते अष्टावक्र प्रकांड विद्वान बन चुका था। उसे पता चला कि उसके पिता राजा जनक के दरबार में विद्वान बंदी से शास्त्रार्थ हारकर जल में डुबो दिए गए थे। अष्टावक्र जनक की सभा की ओर चल पड़ा।
जब वह टेढ़े-मेढ़े कदमों से सभा में पहुँचा, तो वहाँ बैठे पंडित उसकी चाल देखकर ठहाका लगाकर हँसने लगे। अष्टावक्र भी ज़ोर से हँस पड़ा।
राजा जनक ने आश्चर्य से पूछा, "पंडित तुम पर हँस रहे हैं, यह मैं समझ सकता हूँ। पर तुम क्यों हँस रहे हो?"
अष्टावक्र ने कहा, "राजन, मैं सोच रहा था कि मैं विद्वानों की सभा में आया हूँ, पर यह तो चर्मकारों की सभा निकली, जो केवल चमड़ी देखते हैं। मंदिर टेढ़ा हो तो क्या आकाश भी टेढ़ा हो जाता है? घड़ा टूटा हो तो क्या भीतर का आकाश टूट जाता है? मेरा शरीर टेढ़ा है, मैं नहीं।"
सभा में सन्नाटा छा गया। राजा जनक उठे और बालक को प्रणाम किया। अष्टावक्र ने बंदी को शास्त्रार्थ में हराया और पिता को मुक्त कराया।
आगे चलकर राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु बनाया। उनके बीच हुआ संवाद "अष्टावक्र गीता" के नाम से जाना जाता है, जो आत्म-ज्ञान के सबसे गहरे ग्रंथों में गिना जाता है।
