कबूतरों का जाल: एकता की उड़ान
दाने के लालच में सैकड़ों कबूतर बहेलिए के जाल में फँस गए। तब उनके राजा ने एक ऐसी बात कही जिसने सबको बचा लिया।
एक जंगल में चित्रग्रीव नाम का कबूतरों का राजा अपने दल के साथ रहता था। एक दिन वे सब भोजन की खोज में उड़ रहे थे कि नीचे ज़मीन पर चावल के दाने बिखरे दिखे।
कबूतर नीचे उतरने लगे। चित्रग्रीव ने टोका, "रुको! इस सुनसान जंगल में चावल कहाँ से आए? ज़रूर कोई जाल है।" पर एक युवा कबूतर बोला, "बड़ों की हर बात मानें तो भूखे मर जाएँगे।" लालच में सब नीचे उतर गए, और सचमुच बहेलिए का जाल उन पर आ गिरा।
सब घबराकर फड़फड़ाने लगे, एक-दूसरे को दोष देने लगे। दूर से बहेलिया लाठी लेकर आता दिखा।
तब चित्रग्रीव ने शांत स्वर में कहा, "यह समय झगड़ने का नहीं है। अगर हम सब अलग-अलग फड़फड़ाएँगे, तो जाल में और उलझेंगे। पर अगर हम सब एक साथ, एक ही दिशा में उड़ें, तो यह जाल भी हमारे साथ उड़ जाएगा। मेरी गिनती पर: एक, दो, तीन!"
सारे कबूतर एक साथ उड़े, और जाल समेत आकाश में उठ गए। बहेलिया नीचे हक्का-बक्का दौड़ता रह गया।
चित्रग्रीव उन्हें अपने मित्र हिरण्यक नाम के चूहे के पास ले गया। हिरण्यक ने जाल काटना शुरू किया। सबसे पहले वह राजा का बंधन काटने लगा, तो चित्रग्रीव ने रोका, "पहले मेरी प्रजा को मुक्त करो। राजा का धर्म है कि वह सबसे अंत में अपनी चिंता करे।"
हिरण्यक इस बात से बहुत प्रभावित हुआ और उसने सबके बंधन काट दिए।
