🌱 जीवन की सीखपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

दो घड़े: दरार वाले घड़े की कहानी

एक पनिहारिन के दो घड़ों में से एक में दरार थी, जिससे आधा पानी रास्ते में गिर जाता। घड़ा शर्मिंदा था, पर पनिहारिन जानती थी कुछ और।

एक गाँव में एक बूढ़ी पनिहारिन रोज़ दूर नदी से पानी लाती थी। उसके कंधे पर एक बाँस था, जिसके दोनों सिरों पर एक-एक घड़ा लटकता था।

एक घड़ा बिल्कुल ठीक था, वह हमेशा पूरा भरा हुआ घर पहुँचता। दूसरे घड़े में एक दरार थी। नदी से घर तक के लंबे रास्ते में उसका आधा पानी टपक जाता।

यह सिलसिला दो साल चलता रहा। साबुत घड़े को अपने ऊपर बड़ा गर्व था। दरार वाला घड़ा हर दिन शर्मिंदा होता कि वह अपना काम आधा ही कर पाता है।

एक दिन उससे रहा नहीं गया। नदी किनारे उसने पनिहारिन से कहा, "माँ, मुझे माफ़ कर दो। मेरी दरार की वजह से तुम्हारी आधी मेहनत बेकार चली जाती है।"

पनिहारिन मुस्कुराई और बोली, "आज घर लौटते हुए रास्ते के किनारे ध्यान से देखना।"

लौटते समय घड़े ने देखा कि रास्ते के एक ओर रंग-बिरंगे फूल खिले हैं, धूप में चमकते हुए। पर दूसरी ओर बस सूखी मिट्टी थी।

पनिहारिन ने कहा, "क्या तुमने देखा कि फूल केवल तुम्हारी ओर खिले हैं? मैं तुम्हारी दरार के बारे में हमेशा से जानती थी। इसलिए मैंने तुम्हारी तरफ़ फूलों के बीज बो दिए। दो साल से तुम हर दिन उन्हें पानी दे रहे हो। इन्हीं फूलों से मैं रोज़ भगवान को सजाती हूँ। अगर तुम ऐसे न होते, तो ये फूल भी न होते।"

जीवन की सीख की और कथाएँ

🪔 इस कथा की स्मृति में एक दीप

पवित्र घाट पर आपके या आपके प्रियजन के नाम से दीपदान।

दीप सेवा →