गजेंद्र मोक्ष: जब सरोवर में फँसे हाथी ने पुकारा
हज़ार वर्ष तक मगरमच्छ से लड़ते-लड़ते जब गजराज का बल टूट गया, तब उसने एक कमल उठाकर भगवान को पुकारा।
त्रिकूट पर्वत की घाटी में एक सुंदर सरोवर था। एक दिन गजराज गजेंद्र अपने परिवार के साथ जल-क्रीड़ा करने उतरा। तभी एक बलवान मगरमच्छ ने उसका पैर जकड़ लिया।
गजेंद्र ने पूरी शक्ति से पैर खींचा। उसकी हथिनियों और बच्चों ने भी सहायता की, पर मगर टस से मस नहीं हुआ। कथा कहती है कि यह संघर्ष बहुत लंबा चला। धीरे-धीरे परिवार के सदस्य थककर किनारे चले गए। जल में मगर का बल बढ़ता गया, और गजेंद्र का घटता गया।
जब गजेंद्र को लगा कि अब कोई उपाय नहीं बचा, तो उसे पिछले जन्म की स्मृति हुई। वह पूर्वजन्म में इंद्रद्युम्न नामक राजा था और भगवान का भक्त था। उसने सूँड़ से सरोवर का एक कमल तोड़ा, उसे ऊपर उठाया और भगवान की स्तुति की: "हे प्रभु, जो इस जगत के मूल कारण हैं, जो सबके भीतर हैं, मैं उनकी शरण लेता हूँ।"
उस स्तुति में कोई माँग नहीं थी, केवल समर्पण था। भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर इतनी तेज़ी से आए कि गरुड़ की गति भी उन्हें धीमी लगी, और वे स्वयं उतरकर दौड़ पड़े।
सुदर्शन चक्र से उन्होंने मगर का मुख चीर दिया और गजेंद्र को मुक्त किया। मगर भी वास्तव में एक शापित गंधर्व था, जो भगवान के हाथों मुक्ति पाकर अपने लोक चला गया।
कहा जाता है कि संकट के समय गजेंद्र की स्तुति का पाठ मन को साहस देता है, क्योंकि यह याद दिलाता है कि जहाँ हमारा बल समाप्त होता है, वहाँ से भगवान का बल आरंभ होता है।
