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प्रह्लाद और नरसिंह: खंभे से प्रकट हुए भगवान

जिस पिता ने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया, उसी के घर जन्मे बालक ने 'नारायण' कहना नहीं छोड़ा।

असुरराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से विचित्र वरदान माँगा: न दिन में मरूँ न रात में, न घर के भीतर न बाहर, न मनुष्य से न पशु से, न अस्त्र से न शस्त्र से, न धरती पर न आकाश में। वरदान पाकर वह स्वयं को अमर मानने लगा और घोषणा कर दी कि अब केवल उसी की पूजा होगी।

उसी के पुत्र प्रह्लाद जन्म से ही नारायण के भक्त थे। गुरुकुल में भी वे बालकों को हरि-नाम सिखाते। जब पिता ने पूछा, "तुमने सबसे अच्छी बात क्या सीखी?", प्रह्लाद ने उत्तर दिया, "भगवान विष्णु का स्मरण।"

क्रोध में हिरण्यकशिपु ने पुत्र को मारने के अनेक उपाय किए। पहाड़ से गिराया, हाथियों से कुचलवाना चाहा, सर्पों से डसवाया, विष दिया। हर बार प्रह्लाद "नारायण" कहते और सुरक्षित बच जाते। बहन होलिका, जिसे आग में न जलने का वरदान था, प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी। होलिका जल गई, प्रह्लाद बच गए। इसी की स्मृति में होलिका दहन होता है।

अंत में हिरण्यकशिपु ने गरजकर पूछा, "कहाँ है तेरा भगवान? क्या इस खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने शांत भाव से कहा, "वे सर्वत्र हैं, इस खंभे में भी।"

असुर ने खंभे पर गदा मारी। खंभा फटा और उसमें से भयंकर गर्जना के साथ भगवान नरसिंह प्रकट हुए: आधा शरीर मनुष्य का, आधा सिंह का। संध्या का समय था, न दिन न रात। उन्होंने हिरण्यकशिपु को महल की देहरी पर, न भीतर न बाहर, अपनी गोद में, न धरती न आकाश, रखकर अपने नखों से, न अस्त्र न शस्त्र, उसका अंत किया।

ब्रह्मा जी का हर वचन भी सत्य रहा, और भक्त का विश्वास भी। उग्र नरसिंह को शांत करने का साहस किसी देवता में नहीं था। तब प्रह्लाद ही आगे आए, और उनकी स्तुति से भगवान शांत हुए।

स्रोत: श्रीमद्भागवत, सप्तम स्कंध; विष्णु पुराण

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