कबीर के दोहे: जुलाहे की खरी बात
काशी का एक जुलाहा जिसने कपड़ा बुनते-बुनते ऐसी बातें कहीं कि छह सौ साल बाद भी वे हर ज़ुबान पर हैं।
कहते हैं, काशी में लहरतारा तालाब के किनारे नीरू और नीमा नाम के एक जुलाहा दंपती को एक शिशु मिला। उन्होंने उसे पाला और नाम रखा कबीर। कबीर ने जीवन भर करघे पर कपड़ा बुना, और साथ-साथ ऐसे दोहे बुने जो सीधे दिल में उतर जाते हैं।
कबीर गुरु रामानंद को अपना गुरु मानना चाहते थे। एक कथा के अनुसार, वे भोर के अँधेरे में पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। स्नान को जाते रामानंद जी का पाँव उन पर पड़ा और उनके मुख से निकला "राम-राम"। कबीर ने उसी को गुरु-मंत्र मान लिया।
कबीर पाखंड पर खुलकर बोलते थे, चाहे वह किसी भी धर्म का हो। पर उनकी सबसे तीखी बात अपने ही मन के लिए थी:
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥
ज्ञान के दिखावे पर उन्होंने कहा:
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥
और धैर्य के बारे में, जो हर जल्दबाज़ मन को आज भी चाहिए:
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥
उस समय मान्यता थी कि काशी में मरने से मुक्ति मिलती है और मगहर में मरने से नरक। कबीर ने जीवन के अंत में जान-बूझकर मगहर जाना चुना, यह दिखाने के लिए कि मुक्ति स्थान से नहीं, कर्म और भक्ति से मिलती है।
