मीरा का विष का प्याला
राजघराने की बहू मीरा मंदिरों में नाचती-गाती थीं। परिवार ने विष भेजा, और मीरा ने उसे चरणामृत समझकर पी लिया।
राजस्थान के मेड़ता राजघराने में जन्मी मीरा ने बचपन में ही एक साधु से गिरधर गोपाल की एक छोटी सी मूर्ति पाई थी। कहते हैं, एक बार बारात देखकर नन्ही मीरा ने माँ से पूछा, "मेरा दूल्हा कौन है?" माँ ने हँसकर मूर्ति की ओर इशारा कर दिया। मीरा ने उस बात को जीवन भर सच माना।
उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार से हुआ, पर मीरा का मन गिरधर में ही रमा रहा। वे साधु-संतों के साथ बैठतीं, मंदिर में नाचतीं, भजन गातीं। राजघराने को यह सब मर्यादा के विरुद्ध लगा।
पति के देहांत के बाद ससुराल वालों का विरोध और बढ़ गया। कथा कहती है कि उन्हें मारने के कई प्रयास हुए। एक बार फूलों की टोकरी में साँप भेजा गया, पर मीरा ने खोला तो उसमें शालिग्राम मिले।
फिर एक दिन राणा ने विष का प्याला भेजा, और कहलवाया कि यह भगवान का चरणामृत है। मीरा ने बिना संदेह, प्रभु का नाम लेकर प्याला पी लिया। विष उन पर कोई असर नहीं कर सका। मीरा ने स्वयं इसे अपने पदों में गाया:
राणाजी ने विष को प्यालो भेज्यो, पीवत मीरा हाँसी रे।
अंत में मीरा ने राजमहल छोड़ दिया और वृंदावन और फिर द्वारका चली गईं। उनका सबसे प्रसिद्ध पद उनके पूरे जीवन का सार है:
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
लोक-परंपरा कहती है कि द्वारका में रणछोड़ जी के मंदिर में गाते-गाते मीरा उसी मूर्ति में समा गईं।
