⚔️ महाभारतपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

एकलव्य की गुरु-दक्षिणा

द्रोणाचार्य ने जिसे शिष्य बनाने से मना कर दिया, उसने उनकी मूर्ति को गुरु मानकर धनुर्विद्या सीख ली, और फिर अपना अँगूठा दे दिया।

निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य धनुर्विद्या सीखना चाहता था। उसने सुना कि हस्तिनापुर में आचार्य द्रोण राजकुमारों को शिक्षा देते हैं। वह उनके पास पहुँचा और शिष्य बनाने की विनती की। द्रोण ने यह कहकर मना कर दिया कि वे केवल कुरु राजकुमारों के गुरु हैं।

एकलव्य निराश नहीं हुआ। वन में लौटकर उसने मिट्टी से द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाई, उसे गुरु मानकर प्रणाम किया और हर दिन उसके सामने अभ्यास करने लगा। उसकी लगन ऐसी थी कि कुछ ही वर्षों में वह असाधारण धनुर्धर बन गया।

एक दिन पांडव और कौरव शिकार के लिए उसी वन में आए। उनका कुत्ता एकलव्य को देखकर भौंकने लगा। एकलव्य ने सात बाण ऐसे चलाए कि कुत्ते का मुँह बंद हो गया, पर उसे ज़रा भी चोट नहीं लगी। राजकुमार यह कौशल देखकर दंग रह गए।

अर्जुन विशेष रूप से विचलित हुए, क्योंकि द्रोण ने उन्हें संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन दिया था। द्रोण एकलव्य के पास पहुँचे। एकलव्य ने उन्हें देखते ही चरणों में प्रणाम किया और कहा कि वह उन्हीं का शिष्य है।

द्रोण ने कहा, "यदि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, तो गुरु-दक्षिणा दो। मुझे तुम्हारे दाहिने हाथ का अँगूठा चाहिए।" एकलव्य ने बिना एक पल सोचे अँगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया।

यह कथा गुरु-भक्ति और लगन की अद्भुत मिसाल है। साथ ही, सदियों से लोग इस पर भी विचार करते आए हैं कि क्या एकलव्य के साथ न्याय हुआ? यही इस कथा की गहराई है: वह हमें सराहना भी सिखाती है और प्रश्न पूछना भी।

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