⚔️ महाभारतकथा-सार · 2 मिनट पढ़ें

कर्ण का कवच-कुंडल दान

सूर्यदेव ने स्वप्न में चेताया था कि इंद्र छल से कवच माँगने आएँगे। फिर भी कर्ण ने द्वार पर आए याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया।

कर्ण जन्म से ही सूर्यदेव के दिए दिव्य कवच और कुंडल पहने थे। जब तक वे उसके शरीर पर थे, कोई अस्त्र उसे मार नहीं सकता था। साथ ही कर्ण का एक नियम था: दोपहर की सूर्य-पूजा के बाद जो भी याचक आए, उसे खाली हाथ नहीं लौटाना।

देवराज इंद्र अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए चिंतित थे। उन्होंने कर्ण के इसी नियम का लाभ उठाने की योजना बनाई। एक रात सूर्यदेव ने स्वप्न में कर्ण को चेताया, "पुत्र, कल इंद्र ब्राह्मण के वेश में तुम्हारा कवच माँगने आएँगे। मना कर देना, नहीं तो तुम्हारे प्राण संकट में होंगे।"

कर्ण ने विनम्रता से उत्तर दिया, "पिताश्री, यदि मेरे द्वार से कोई याचक खाली लौटा, तो मेरा जीवन ही व्यर्थ है। यश के बिना जीने से अच्छा है यश के साथ मरना।"

अगले दिन सूर्य-पूजा के बाद एक ब्राह्मण आया और कवच-कुंडल माँगे। कर्ण ने उसे पहचान लिया, मुस्कुराए, और कहा, "देवराज, आप स्वयं याचक बनकर आए हैं, यह मेरा सौभाग्य है।"

कवच शरीर से जुड़ा था। कर्ण ने खड्ग से उसे काटकर अलग किया और रक्त से भीगे हाथों से कवच-कुंडल इंद्र को दे दिए।

कर्ण की इस उदारता से इंद्र भी लज्जित हुए। बदले में उन्होंने कर्ण को अपनी अमोघ शक्ति दी, जिसे एक बार चलाया जा सकता था। इसी दिन से कर्ण "दानवीर" कहलाए।

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