🔱 शिव और शक्तिपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

गणेश जी की परिक्रमा: माता-पिता में संसार

कार्तिकेय मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा करने उड़ गए। गणेश जी ने अपने चूहे पर बैठे-बैठे ही प्रतियोगिता कैसे जीत ली?

एक बार कैलाश पर यह प्रश्न उठा कि शिव-पार्वती के दोनों पुत्रों में से पहले किसका विवाह हो। माता-पिता ने एक प्रतियोगिता रखी: "जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, वही विजेता।"

कार्तिकेय ने बिना देर किए अपना मोर उठाया और आकाश में उड़ गए। मोर की गति तेज़ थी, और उन्हें पूरा विश्वास था कि वे ही जीतेंगे।

गणेश जी ने अपने वाहन मूषक की ओर देखा। चूहे पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा में तो युग बीत जाते। वे कुछ देर शांत बैठे सोचते रहे। फिर उन्होंने स्नान किया, माता-पिता को आसन पर बिठाया, उनकी पूजा की और श्रद्धा से उनकी सात परिक्रमा कर लीं।

फिर हाथ जोड़कर बोले, "मेरी परिक्रमा पूरी हुई।" माता पार्वती ने मुस्कुराकर पूछा, "पर तुम तो कहीं गए ही नहीं?"

गणेश जी ने उत्तर दिया, "शास्त्र कहते हैं कि माता-पिता की परिक्रमा करने वाले को पृथ्वी की परिक्रमा का फल मिलता है। मेरे लिए तो आप दोनों ही समस्त ब्रह्मांड हैं।"

शिव और पार्वती इस उत्तर से अत्यंत प्रसन्न हुए। जब कार्तिकेय लौटे, तब तक निर्णय हो चुका था। गणेश जी की बुद्धि और भक्ति के कारण ही उन्हें "बुद्धि के देवता" कहा जाता है और हर शुभ कार्य में सबसे पहले उन्हीं की पूजा होती है।

स्रोत: शिव पुराण, रुद्र संहिता (लोक-प्रचलित रूप)

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