🔱 शिव और शक्तिपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

गंगा अवतरण: भगीरथ का तप और शिव की जटाएँ

पूर्वजों की मुक्ति के लिए भगीरथ गंगा को धरती पर लाना चाहते थे, पर गंगा का वेग पृथ्वी को तोड़ सकता था।

अयोध्या के राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र कपिल मुनि के क्रोध से भस्म हो गए थे। उनकी मुक्ति का एक ही उपाय था: स्वर्ग की नदी गंगा का पवित्र जल उनकी भस्म को छुए।

राजा सगर, फिर उनके पौत्र अंशुमान, फिर अंशुमान के पुत्र दिलीप, सबने प्रयास किया, पर सफल न हुए। तीन पीढ़ियाँ बीत गईं। तब दिलीप के पुत्र भगीरथ ने राजपाट छोड़ा और हिमालय पर कठोर तप करने चले गए।

वर्षों के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने गंगा को धरती पर भेजना स्वीकार किया। पर एक समस्या थी। गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि वह पृथ्वी को चीरकर पाताल में चली जाती। कोई तो उस वेग को थामे।

भगीरथ ने फिर तप किया, इस बार भगवान शिव का। आशुतोष शीघ्र प्रसन्न हुए और गंगा को अपने सिर पर धारण करने को तैयार हो गए।

गंगा को अपने वेग पर गर्व था। वे पूरे बल से शिव के मस्तक पर गिरीं, यह सोचकर कि उन्हें भी बहा ले जाएँगी। पर महादेव ने अपनी जटाएँ फैला दीं और गंगा उनमें ऐसे खो गईं कि बाहर का रास्ता ही न मिला।

भगीरथ ने फिर विनती की। तब शिव ने अपनी एक जटा खोली और गंगा की एक शांत धारा धरती पर उतरी। आगे-आगे भगीरथ का रथ चला और पीछे-पीछे गंगा। रास्ते में जह्नु ऋषि का आश्रम बहा तो उन्होंने गंगा को पी लिया, और भगीरथ की प्रार्थना पर कान से निकाला। इसीलिए गंगा "जाह्नवी" भी कहलाती हैं।

अंत में गंगा ने सगर-पुत्रों की भस्म को छुआ और उन्हें मुक्ति मिली। भगीरथ के नाम पर गंगा "भागीरथी" कहलाईं, और "भगीरथ प्रयास" आज भी असंभव को संभव करने वाले परिश्रम का नाम है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, बालकांड; भागवत, नवम स्कंध

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