नीलकंठ: जब महादेव ने संसार का विष पी लिया
समुद्र मंथन से अमृत से पहले हलाहल विष निकला, जिसकी ज्वाला से सृष्टि जलने लगी। तब कैलाशपति आगे आए।
देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत पाने के लिए क्षीरसागर का मंथन शुरू किया। मंदराचल पर्वत मथानी बना, वासुकि नाग रस्सी, और भगवान विष्णु ने कच्छप बनकर पर्वत को अपनी पीठ पर थामा।
पर अमृत से पहले समुद्र से निकला हलाहल, ऐसा भयंकर विष जिसकी ज्वाला से दसों दिशाएँ जलने लगीं। देवता, असुर, ऋषि, सबका दम घुटने लगा। किसी के पास कोई उपाय नहीं था।
सब मिलकर कैलाश पहुँचे और महादेव से प्रार्थना की। भगवान शिव ने माता पार्वती की ओर देखा। माता ने सहमति दी, क्योंकि वे जानती थीं कि उनके स्वामी का स्वभाव ही करुणा है।
महादेव ने उस विष को अंजलि में लिया और पी गए। माता पार्वती ने तुरंत उनके कंठ को थाम लिया ताकि विष नीचे न उतरे और भीतर बसे ब्रह्मांड को हानि न पहुँचे। विष उनके कंठ में ही रुक गया और कंठ नीला पड़ गया। तभी से वे "नीलकंठ" कहलाए।
विष की ज्वाला शांत करने के लिए देवताओं ने उनका जल से अभिषेक किया। चंद्रमा को उनके मस्तक पर स्थान मिला और गंगा की शीतल धारा ने उन्हें ठंडक दी। कहा जाता है कि शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा इसी करुणा की स्मृति है।
विष पीने के बाद ही मंथन से लक्ष्मी, कामधेनु, कल्पवृक्ष और अंत में अमृत निकला। इस कथा का संकेत गहरा है: जीवन के मंथन में पहले कठिनाइयाँ निकलती हैं, और जो उन्हें धैर्य से सह लेता है, उसी के लिए आगे अमृत है।
