हनुमान और संजीवनी: जब पूरा पर्वत उठा लाए
लक्ष्मण मूर्छित थे और सूर्योदय से पहले संजीवनी चाहिए थी। हनुमान जी जड़ी पहचान न पाए, तो उन्होंने क्या किया?
युद्ध में मेघनाद के शक्ति-बाण से लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े। श्रीराम भाई का सिर गोद में लिए विलाप करने लगे। पूरी सेना शोक में डूब गई।
लंका के राजवैद्य सुषेण बुलाए गए। उन्होंने कहा, "हिमालय पर द्रोणगिरि पर्वत है। वहाँ संजीवनी बूटी मिलती है। यदि सूर्योदय से पहले वह आ जाए, तो लक्ष्मण बच सकते हैं।"
हिमालय हज़ारों कोस दूर था और रात छोटी। सबकी आँखें एक ही ओर गईं: हनुमान। उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया और आकाश में उड़ चले।
रास्ते में रावण के भेजे कालनेमि राक्षस ने साधु का वेश बनाकर उन्हें रोकना चाहा, पर हनुमान जी ने छल पहचान लिया और आगे बढ़े। द्रोणगिरि पहुँचे तो चाँदनी रात में पर्वत पर अनगिनत जड़ी-बूटियाँ चमक रही थीं। कौन सी संजीवनी है, यह पहचानना कठिन था।
समय निकल रहा था। हनुमान जी ने सोचा, पहचानने में देर हुई तो अनर्थ हो जाएगा। उन्होंने पूरा पर्वत ही उखाड़कर हथेली पर उठा लिया और लंका की ओर उड़ चले।
अयोध्या के ऊपर से गुज़रते समय भरत ने उन्हें कोई राक्षस समझकर बाण चला दिया। हनुमान जी "राम" कहते हुए गिरे। भरत ने जब पूरी बात जानी तो अपने बाण पर बिठाकर उन्हें तुरंत लंका भेजने का प्रस्ताव किया। हनुमान जी ने विनम्रता से मना किया और फिर उड़ चले।
सूर्योदय से पहले पर्वत लंका पहुँच गया। सुषेण ने संजीवनी पहचानी, औषधि दी, और लक्ष्मण उठ बैठे। श्रीराम ने हनुमान को गले लगाकर कहा, "तुम मुझे भरत के समान प्रिय हो।"
