🏹 रामायणपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

शबरी के जूठे बेर

वर्षों तक श्रीराम की राह देखती वृद्धा शबरी ने हर बेर चखकर केवल मीठे बेर रखे। प्रभु ने वही प्रेम से खाए।

पंपा सरोवर के पास मतंग ऋषि का आश्रम था। वहाँ भील जाति की एक स्त्री शबरी गुरु की सेवा करती थीं। देह छोड़ने से पहले मतंग ऋषि ने कहा, "शबरी, एक दिन श्रीराम स्वयं यहाँ आएँगे। तुम उनकी प्रतीक्षा करना।"

उस दिन से शबरी की हर सुबह एक ही काम से शुरू होती: रास्ते के काँटे हटाना, फूल बिछाना और राम के लिए बेर इकट्ठा करना। दिन बीते, वर्ष बीते, शबरी के बाल सफ़ेद हो गए, कमर झुक गई, पर प्रतीक्षा नहीं थकी।

हर दिन वे बेर तोड़तीं और एक-एक चखकर देखतीं। खट्टा होता तो फेंक देतीं, मीठा होता तो टोकरी में रख लेतीं। उन्हें यह ध्यान ही नहीं रहा कि चखा हुआ फल जूठा होता है। उनके मन में बस एक बात थी: मेरे राम को एक भी खट्टा बेर न मिले।

और फिर एक दिन, सीता की खोज में भटकते राम और लक्ष्मण सचमुच उस आश्रम में पहुँचे। शबरी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने प्रभु के चरण धोए, आसन दिया, और वही टोकरी आगे रख दी।

लक्ष्मण ने देखा कि बेर जूठे हैं, पर राम ने बड़े प्रेम से एक-एक बेर खाया और हर बेर की प्रशंसा की। कहते हैं, राम ने बाद में कहा कि ऐसा स्वाद उन्हें राजमहल के पकवानों में भी नहीं मिला।

श्रीराम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया और कहा कि इन नौ में से एक भी गुण जिसमें हो, वह मुझे प्रिय है, और तुममें तो सभी हैं। फिर शबरी ने ही उन्हें ऋष्यमूक पर्वत और सुग्रीव का मार्ग बताया।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड; रामचरितमानस

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