🏹 रामायणपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

रामसेतु की नन्ही गिलहरी

जब वानर सेना विशाल पत्थरों से सेतु बना रही थी, तब एक गिलहरी अपनी पीठ पर रेत ढो रही थी। श्रीराम ने उसे क्या दिया?

लंका तक पहुँचने के लिए समुद्र पर सेतु बन रहा था। नल और नील के निर्देशन में वानर और भालू बड़े-बड़े पत्थर और पेड़ उठाकर ला रहे थे। हर पत्थर पर "राम" लिखा जाता और वह पानी पर तैर जाता।

उस शोर-शराबे के बीच एक नन्ही गिलहरी भी कुछ कर रही थी। वह समुद्र के पानी में डुबकी लगाती, फिर किनारे की रेत में लोटती, और दौड़कर सेतु पर जाकर अपने शरीर की रेत झाड़ देती। फिर लौटती, फिर डुबकी, फिर रेत। बार-बार, बिना रुके।

एक वानर ने हँसकर कहा, "अरे छोटी, रास्ते से हटो! हम पहाड़ ढो रहे हैं और तुम रेत के दाने गिरा रही हो? कहीं पैरों तले न आ जाना।"

गिलहरी रुकी और बोली, "मैं पहाड़ नहीं उठा सकती, पर पत्थरों के बीच की खाली जगह तो भर सकती हूँ, ताकि प्रभु के पैरों को चोट न लगे।"

यह बात श्रीराम ने सुन ली। वे उठे, गिलहरी को धीरे से हथेली पर उठाया और वानरों से बोले, "तुम सबकी सेवा महान है, पर इसकी सेवा भी उतनी ही सच्ची है। इसने अपना पूरा सामर्थ्य लगा दिया है।"

फिर प्रभु ने स्नेह से गिलहरी की पीठ पर अपनी उंगलियाँ फेरीं। लोक-कथा कहती है कि तभी से गिलहरियों की पीठ पर तीन धारियाँ हैं: श्रीराम की उंगलियों के निशान।

यह कथा हमें याद दिलाती है कि किसी बड़े काम में हमारा योगदान कितना भी छोटा क्यों न लगे, यदि वह पूरे मन से किया गया है, तो भगवान की दृष्टि में वह कभी छोटा नहीं होता।

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