🔥 वेद और उपनिषदपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

नचिकेता और यमराज: मृत्यु से पूछा गया प्रश्न

एक बालक यमराज के द्वार पर तीन दिन भूखा-प्यासा बैठा रहा, और फिर मृत्यु के देवता से वह प्रश्न पूछा जिसका उत्तर देवता भी नहीं जानते।

ऋषि वाजश्रवस ने एक बड़ा यज्ञ किया, जिसमें सब कुछ दान करना था। पर दान में वे बूढ़ी, दूध न देने वाली गायें दे रहे थे। उनके पुत्र नचिकेता को यह ठीक नहीं लगा। उसने पूछा, "पिताजी, आप मुझे किसे दान करेंगे?" दो-तीन बार पूछने पर पिता ने क्रोध में कहा, "तुझे मैं मृत्यु को देता हूँ!"

नचिकेता ने पिता के वचन को सत्य माना और यमलोक पहुँच गया। यमराज घर पर नहीं थे। वह बालक तीन दिन तक उनके द्वार पर बिना अन्न-जल के बैठा रहा।

लौटकर यमराज को बड़ा खेद हुआ कि अतिथि भूखा रहा। उन्होंने कहा, "तीन रातों के बदले तीन वर माँगो।" पहले वर में नचिकेता ने माँगा कि पिता का क्रोध शांत हो और वे उसे प्रेम से स्वीकारें। दूसरे में स्वर्ग दिलाने वाली अग्नि-विद्या माँगी।

तीसरा वर था: "मनुष्य के मरने के बाद कुछ लोग कहते हैं वह रहता है, कुछ कहते हैं नहीं रहता। मुझे इसका सत्य बताइए।"

यमराज ने टालना चाहा: "यह प्रश्न देवताओं के लिए भी कठिन है। इसके बदले सौ वर्ष की आयु, धन, हाथी-घोड़े, राज्य, सुंदर अप्सराएँ माँग लो।" नचिकेता ने शांत भाव से उत्तर दिया, "ये सब कल नष्ट हो जाएँगे। मुझे वही उत्तर चाहिए।"

बालक की दृढ़ता से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे आत्मा का ज्ञान दिया: आत्मा न जन्मती है, न मरती है। शरीर के नष्ट होने पर भी वह नष्ट नहीं होती। उन्होंने "श्रेय" (कल्याण) और "प्रेय" (सुखद) का भेद भी समझाया: बुद्धिमान श्रेय चुनता है।

इसी उपनिषद का प्रसिद्ध आह्वान है:

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।

उठो, जागो, और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो।

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