श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि': नमक का पाठ
बारह वर्ष पढ़कर घमंड से लौटे बेटे से पिता ने एक सरल प्रश्न पूछा, और फिर पानी में घुले नमक से उसे सबसे बड़ा सत्य समझाया।
ऋषि उद्दालक आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु बारह वर्ष गुरुकुल में पढ़कर लौटा। उसे अपने ज्ञान पर बड़ा गर्व था। पिता ने उसका अहंकार देखा और पूछा, "बेटा, क्या तुमने वह ज्ञान पाया, जिसे जानने से बिना सुना सुन लिया जाता है, बिना जाना जान लिया जाता है?"
श्वेतकेतु चकित हुआ। "ऐसा कौन सा ज्ञान है, पिताजी?"
उद्दालक ने समझाया, "जैसे मिट्टी के एक ढेले को जान लेने से मिट्टी की बनी हर चीज़ जान ली जाती है, घड़ा हो या दीया, बस नाम और आकार अलग हैं, वैसे ही एक सत्य है जिससे सब कुछ बना है।"
फिर उन्होंने कहा, "एक बर्तन में पानी लो और उसमें यह नमक डाल दो। कल सुबह मेरे पास लाना।" अगली सुबह पिता ने कहा, "अब नमक निकालकर दिखाओ।" श्वेतकेतु ने ढूँढा, पर नमक दिखा नहीं, वह घुल चुका था।
"ऊपर से थोड़ा पानी चखो।" "खारा है।" "बीच से चखो।" "खारा है।" "नीचे से?" "खारा है।"
उद्दालक मुस्कुराए, "जैसे यह नमक दिखता नहीं पर पूरे पानी में है, वैसे ही वह सूक्ष्म सत्य, आत्मा, इस पूरे जगत में व्याप्त है। तुम उसे देख नहीं पाते, पर वह यहीं है।" और फिर उन्होंने वह महावाक्य कहा:
तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
"श्वेतकेतु, वह तुम ही हो।" जिस सत्य को तुम बाहर खोज रहे हो, वही तुम्हारे भीतर है।
उस दिन श्वेतकेतु का अहंकार भी नमक की तरह घुल गया।
