🔥 वेद और उपनिषदपूरी कथा · 2 मिनट पढ़ें

सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला शिष्य

गुरुकुल में प्रवेश के लिए पिता का नाम पूछा गया। सत्यकाम को अपना गोत्र नहीं पता था, पर उसने सच कहा।

सत्यकाम नाम का एक बालक अपनी माँ जबाला के साथ रहता था। उसे वेद पढ़ने की बड़ी इच्छा थी। गुरुकुल जाने से पहले उसने माँ से पूछा, "माँ, गुरुजी मेरा गोत्र पूछेंगे। मेरा गोत्र क्या है?"

माँ ने सच्चाई से कहा, "बेटा, युवावस्था में मैं अनेक घरों में सेवा करती थी। उसी समय तुम्हारा जन्म हुआ। मुझे नहीं पता तुम्हारा गोत्र क्या है। मेरा नाम जबाला है और तुम्हारा सत्यकाम। तुम कहना कि मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।"

सत्यकाम ऋषि हारिद्रुमत गौतम के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने पूछा, "वत्स, तुम्हारा गोत्र क्या है?" सत्यकाम ने बिना झिझके माँ की कही हर बात दोहरा दी।

आश्रम के दूसरे शिष्य हँसने लगे, पर ऋषि गौतम गंभीर हो गए। उन्होंने कहा, "ऐसा सत्य केवल एक सच्चा ब्राह्मण ही बोल सकता है। तुमने सत्य नहीं छोड़ा, इसलिए मैं तुम्हें शिष्य स्वीकार करता हूँ।"

गुरु ने उसे चार सौ दुबली गायें दीं और कहा, "जब ये हज़ार हो जाएँ, तब लौटना।" सत्यकाम बरसों तक वन में गायें चराता रहा। कथा कहती है कि उस एकांत में प्रकृति ने ही उसे पढ़ाया: एक बैल ने, अग्नि ने, एक हंस ने और एक जलपक्षी ने उसे ब्रह्म के अलग-अलग रूप समझाए।

जब वह हज़ार गायें लेकर लौटा, तो गुरु ने उसका चेहरा देखते ही कहा, "तुम्हारा मुख ब्रह्मज्ञानी की तरह चमक रहा है।" आगे चलकर सत्यकाम जाबाल स्वयं एक महान ऋषि बने।

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