अर्जुन का विषाद: जब महायोद्धा के हाथ से गांडीव छूट गया
कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच खड़े अर्जुन ने अपनों को सामने देखा और धनुष रख दिया। यहीं से गीता का जन्म हुआ।
कुरुक्षेत्र के मैदान में शंख बज चुके थे। अर्जुन ने अपने सारथी श्रीकृष्ण से कहा, "मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलिए, मैं देखूँ कि मुझे किन से लड़ना है।"
रथ बीच में रुका। अर्जुन ने देखा, सामने पितामह भीष्म खड़े हैं जिनकी गोद में वे खेले थे। गुरु द्रोण खड़े हैं जिन्होंने उन्हें धनुष पकड़ना सिखाया। चचेरे भाई, मामा, मित्र, सब शस्त्र लिए खड़े हैं।
अर्जुन का शरीर काँपने लगा। मुँह सूख गया, गांडीव हाथ से फिसलने लगा। उन्होंने कहा, "केशव, मुझे ऐसी विजय नहीं चाहिए जिसके लिए अपनों का रक्त बहाना पड़े। इससे तो भिक्षा माँगकर जीना अच्छा है।" और वे धनुष रखकर रथ में बैठ गए।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
अर्जुन ने स्वीकार किया, "मेरा स्वभाव दुर्बलता से दब गया है, मुझे धर्म समझ नहीं आ रहा। मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे बताइए कि मेरे लिए क्या कल्याणकारी है।"
यही क्षण गीता का आरंभ है। अर्जुन का विषाद कायरता नहीं था, वह एक संवेदनशील मनुष्य का संकट था। और श्रीकृष्ण ने उसे डाँटकर नहीं, समझाकर उठाया। उन्होंने आत्मा की अमरता, कर्तव्य का अर्थ और बिना आसक्ति के कर्म करने की कला समझाई।
इस अध्याय को "विषाद योग" कहा गया है, यानी दुःख भी योग बन सकता है, यदि वह हमें सत्य की खोज की ओर ले जाए।
