स्थितप्रज्ञ कौन है?
अर्जुन ने पूछा, जिसकी बुद्धि स्थिर हो, वह कैसे बोलता, बैठता और चलता है? श्रीकृष्ण का उत्तर आज भी मन की शांति का सूत्र है।
गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन एक बहुत व्यावहारिक प्रश्न पूछते हैं: "केशव, स्थितप्रज्ञ, यानी जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है, उसकी पहचान क्या है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है?"
श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं:
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
जब मनुष्य मन में उठने वाली सारी कामनाओं को छोड़ देता है और अपने आप में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
श्रीकृष्ण आगे कछुए का सुंदर उदाहरण देते हैं। जैसे कछुआ खतरा देखते ही अपने अंग भीतर समेट लेता है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ अपनी इंद्रियों को विषयों से समेट सकता है। वह आँखें बंद करके संसार से भागता नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी उसकी पकड़ में नहीं आता।
फिर वे एक गहरी श्रृंखला बताते हैं: विषयों का चिंतन करने से आसक्ति होती है, आसक्ति से कामना, कामना पूरी न हो तो क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से स्मृति का भ्रम, और स्मृति के भ्रम से बुद्धि का नाश। एक छोटा सा विचार कैसे विनाश तक ले जाता है, यह मनोविज्ञान आज भी उतना ही सच है।
अंत में श्रीकृष्ण समुद्र का उदाहरण देते हैं। हज़ारों नदियाँ समुद्र में गिरती हैं, पर समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता। वैसे ही इच्छाएँ आती हैं, पर स्थितप्रज्ञ विचलित नहीं होता। वही सच्ची शांति पाता है।
