कर्मण्येवाधिकारस्ते: कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक हमें फल की चिंता छोड़कर कर्म करने को कहता है। पर क्या इसका अर्थ है कि परिणाम की परवाह ही न करें?
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात, तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। फल की इच्छा को कर्म का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
एक किसान का उदाहरण लीजिए। वह खेत जोतता है, अच्छा बीज बोता है, समय पर पानी देता है। यह सब उसके हाथ में है। पर वर्षा कब होगी, ओले पड़ेंगे या नहीं, यह उसके हाथ में नहीं। यदि वह हर दिन केवल फसल की चिंता में डूबा रहे, तो न ठीक से सो पाएगा, न ठीक से काम कर पाएगा।
श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि लक्ष्य मत रखो। वे कहते हैं कि लक्ष्य की चिंता को अपने कर्म पर हावी मत होने दो। जो विद्यार्थी केवल अंकों के डर से पढ़ता है, वह घबराता है। जो विषय में डूबकर पढ़ता है, उसके अंक अपने आप अच्छे आते हैं।
श्लोक का अंतिम भाग भी उतना ही ज़रूरी है: "मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि", यानी फल मेरे हाथ में नहीं है, यह सोचकर काम छोड़ भी मत देना। आलस्य को वैराग्य का नाम देना गीता का संदेश नहीं है।
यही "निष्काम कर्म" है: पूरी निष्ठा से कर्म, और परिणाम को प्रसाद की तरह स्वीकार करना।
